डलमऊ में पुलिस की मौजूदगी में कथित देशविरोधी नारे, कार्रवाई सिर्फ एक पर! बाकी 7-8 लोगों का क्या हुआ

रायबरेली। बारावफात के जुलूस में कथित आपत्तिजनक और उकसावे वाली नारेबाजी के मामले में डलमऊ पुलिस की कार्रवाई अब खुद कठघरे में खड़ी नजर आ रही है… राहगीरों की माने तो देश विरोधी नारे डलमऊ पुलिस की मौजूदगी में लगते रहे सूत्रों की माने तो पुलिस दर्जनो लोगो को थाने ले गयी इतना ही नही चौकी इंचार्ज सोनू पटेल की रिपोर्ट में फिलिस्तीन समर्थन के साथ गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सजा, सर तन से जुदा जैसे कथित नारे लगाए जाने का उल्लेख करते हुए इसे एक समुदाय की भावनाएं आहत होने की प्रबल संभावना वाला मामला बताया गया…रिपोर्ट में आरोपी अफजल कुरैशी को शांति व्यवस्था के लिए संभावित खतरा बताते हुए गिरफ्तारी की गई। लेकिन पुलिस की इसी रिपोर्ट ने कार्रवाई के दायरे को लेकर कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं…गोपनीय सूत्रों के अनुसार, घटनाक्रम के बाद पुलिस करीब 7-8 लोगों को डलमऊ पुलिस थाने भी उठा लायी,लेकिन बाद में कार्रवाई कथित तौर पर महज एक व्यक्ति तक सीमित रह गई। ऐसे मे पुलिस की मौजूदगी में देशविरोधी नारेबाजी और कार्यवाही के नाम पर खानापूर्ति अपने आप में डलमऊ पुलिस की कार्यशैली व निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करती है ऐसे में सिर्फ एक पर कार्यवाही होने पर सवाल उठना लाजिमी है कि बाकी लोगों की भूमिका की जांच कहां गई..? क्या उनकी पहचान नहीं हो सकी, या पहचान के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई…? मामले की गंभीरता को पुलिस की अपनी रिपोर्ट से ही समझा जा सकता है। रिपोर्ट में कहा गया कि आरोपी को नहीं रोका जाता तो वह लगातार भाषण देकर क्षेत्र की कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर समस्या पैदा कर सकता था। ऐसे में पुलिस की कार्रवाई पर सवाल यह नहीं है कि गिरफ्तारी क्यों हुई, बल्कि सवाल यह है कि अगर नारेबाजी कानून-व्यवस्था के लिए इतनी गंभीर थी तो कार्रवाई का दायरा एक नाम तक क्यों सिमट गया..? अफजल को गिरफ्तार कर बाद में जमानत मिल जाना न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है। मगर जमानत से वह मूल सवाल खत्म नहीं होता जो अब डलमऊ पुलिस की कार्यप्रणाली के सामने खड़ा है क्या पुलिस ने पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच की या एक गिरफ्तारी को ही कार्रवाई की पूर्णता मान लिया..? एक पर कठोरता और बाकी पर खामोशी की स्थिति यदि तथ्यात्मक रूप से सही निकलती है तो डलमऊ पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। अब निगाह इस बात पर है कि पुलिस बताएगी कि कथित नारेबाजी में शामिल बताए जा रहे बाकी लोगों की पहचान क्या हुई, उनकी भूमिका की जांच हुई या नहीं, और यदि हुई तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई..? क्योंकि संवेदनशील मामलों में आधी कार्रवाई अक्सर विवाद खत्म नहीं करती बल्कि पुलिस की कार्यशैली पर उससे भी बड़े सवाल खड़े कर देती है। वही मामले में अपर पुलिस अधीक्षक से बात करने की कोशिश की गई उन्होंने मामले की जानकारी करके जांचोंपरांत निष्पक्ष कार्यवाही की बात कही हालांकि संबंधित प्रकरण को इस कदर दबाया गया कि देश विरोधी नारे लगे ऐसे गंभीर मामले की जानकारी जिले के खाकी के आला अफसरो तक भी डलमऊ पुलिस ने नहीं पहुंचने दिया।


