
सलोन थानेदार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल, डेढ़ माह में ही शिकायतों से घिरी खाकी
सलोन थानेदार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल, डेढ़ माह में ही शिकायतों से घिरी खाकी
रायबरेली। थाने की चौखट पर फरियाद दबे, तो सवाल सिर्फ थानेदार पर नहीं, पूरी व्यवस्था पर उठता है…सलोन थाने की कमान संभाले इंस्पेक्टर संदीप कुमार राय को अभी करीब डेढ़ माह ही हुआ है, लेकिन इतने कम समय में उनकी कथित कार्यशैली को लेकर उठ रही शिकायतों ने पुलिस महकमे के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। फरियादियों से कथित अभद्र व्यवहार, शिकायतों पर कार्रवाई को लेकर उठते प्रश्न और सुल्तानपुर में उनके पूर्व कार्यकाल से जुड़ा मुकदमा इन सबने सलोन पुलिसिंग की कार्यप्रणाली को सवालों के घेरे में ला दिया है। इसी बीच मुकदमा संख्या 403/2025 की 25 सितंबर को प्रस्तावित न्यायालयीन कार्यवाही ने पुराने प्रकरण को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। आरोप है कि थाने पहुंचने वाले कुछ फरियादियों की शिकायत सुनने के बजाय उनके साथ कथित तौर पर डांट-डपट और अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया जाता है। कुछ पीड़ितों द्वारा फोन और सोशल मीडिया के माध्यम से ऐसी शिकायतें किए जाने की बात भी सामने आ रही है। यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं तो मामला महज व्यवहार का नहीं, बल्कि थाने में शिकायतों के निस्तारण की पूरी प्रक्रिया का बन जाता है। क्योंकि मुकदमा दर्ज करना हो या शिकायत को जांच के बाद निस्तारित करना दोनों ही स्थितियों में कानून सम्मत प्रक्रिया और फरियादी के साथ मर्यादित व्यवहार अपेक्षित है। इंस्पेक्टर संदीप राय से जुड़े सवालों की एक कड़ी उनके सुल्तानपुर कार्यकाल तक भी पहुंचती है। ग्राम पाचो पीरन, कोतवाली नगर सुल्तानपुर निवासी अफरोज बानो से जुड़े चोरी हुए ट्रक के मामले में उपलब्ध विवरण के मुताबिक शिकायत के बावजूद तत्काल मुकदमा दर्ज नहीं हुआ। बाद में न्यायालय के आदेश पर मुकदमा संख्या 403/2025 दर्ज किया गया…मामले की विवेचना के बाद 14 मई 2026 को लम्भुआ थाने के दरोगा मलखान सिंह द्वारा अंतिम रिपोर्ट दाखिल किए जाने की बात सामने आई है। चर्चाएं ये भी हैं कि ट्रक की बरामदगी और कथित आरोपियों की भूमिका से जुड़े पहलुओं की पर्याप्त पड़ताल नहीं की गई। हालांकि इन चर्चाओ की पुष्टि केस डायरी, विवेचना अभिलेख और न्यायालयीन रिकॉर्ड के परीक्षण से ही संभव है…अब इसी मामले में 25 सितंबर 2026 को न्यायालय में सुनवाई प्रस्तावित है। अंतिम रिपोर्ट को चुनौती दिए जाने की बात भी सामने आ रही है। ऐसे में अगली न्यायालयीन कार्यवाही यह स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण होगी कि विवेचना के दौरान पुलिस के सामने कौन से तथ्य थे और किन आधारों पर अंतिम रिपोर्ट दाखिल की गई।
*थानेदार के पुराने कार्यकाल के सवालों के बीच सलोन की नई शिकायतें*
संदीप राय के सुल्तानपुर कार्यकाल से जुड़े पुराने घटनाक्रम का संदर्भ भी मौजूदा शिकायतों के बीच फिर सामने आया है। तत्कालीन पुलिस अधीक्षक चारु निगम के कार्यकाल में उनकी तैनाती और जिम्मेदारी में हुए बदलाव को लेकर भी चर्चाएं रही हैं। हालांकि किसी अधिकारी के स्थानांतरण अथवा जिम्मेदारी बदले जाने मात्र से किसी आरोप की पुष्टि नहीं होती और इसके लिए आधिकारिक अभिलेख ही निर्णायक होंगे…मगर मौजूदा स्थिति में असली सवाल यह है कि सलोन थाने में शिकायत लेकर पहुंचने वाले व्यक्ति के साथ पुलिस का व्यवहार और शिकायत निस्तारण की प्रक्रिया कैसी है…यदि किसी प्रकरण में एफआईआर के पर्याप्त आधार हैं तो कार्रवाई होनी चाहिए और यदि मामला जांच योग्य है तो नियमानुसार जांच होनी चाहिए….शिकायत निराधार पाए जाने पर भी उसका विधिसम्मत निस्तारण जरूरी है। फरियादी को डांटकर या कथित अभद्रता के बाद वापस भेज देना किसी भी स्थिति में शिकायत निस्तारण की वैधानिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं हो सकता…अब पुलिस अधिकारियों के सामने यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सलोन थाने में पिछले डेढ़ माह के दौरान प्राप्त शिकायतों में कितनी एफआईआर दर्ज हुईं, कितने मामलों में जांच हुई, कितनी शिकायतें निस्तारित की गईं और कितने मामलों में फरियादियों को न्यायालय की शरण लेनी पड़ी। यही आंकड़े मौखिक चर्चाओं से कहीं अधिक साफ तस्वीर सामने ला सकते हैं…इंस्पेक्टर संदीप कुमार राय की कार्यशैली को लेकर उठ रहे सवालों का अंतिम फैसला आरोपों या चर्चाओं से नहीं, बल्कि पुलिस अभिलेख, जीडी, एफआईआर, विवेचना दस्तावेज, शिकायतों और न्यायालयीन रिकॉर्ड से ही होगा। फिलहाल 403/2025 की 25 सितंबर की सुनवाई और सलोन थाने की शिकायतों की निष्पक्ष समीक्षा पर निगाहें टिकी हैं। सवाल अब केवल थानेदार की कार्यशैली का नहीं, बल्कि यह है कि सलोन की चौखट पर पहुंचने वाले फरियादी को कानून के मुताबिक सुनवाई मिल रही है या नहीं।


