रायबरेली/डलमऊ। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र डलमऊ की बदहाल व्यवस्थाओं को लेकर सामने आने वाले वीडियो अब किसी एक दिन की अव्यवस्था का मामला नहीं रह गए हैं। कभी मरीज के सिर पर टांके लगाने का काम स्वीपर के हाथों होने का वीडियो सामने आता है तो कभी स्ट्रेचर के अभाव में मरीज के जमीन पर पड़े तड़पने की तस्वीरें व्यवस्था की पोल खोलती हैं….अब दवा वितरण काउंटर पर घंटों इंतजार करते मरीजों का वीडियो सामने आने के बाद एक बार फिर सीएचसी की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है….विडंबना यह है कि हर बार व्यवस्था सुधारने के बजाय वायरल वीडियो की सत्यता पर सवाल खड़े करने की कवायद अधिक दिखाई देती है…. इस बार भी मरीजों द्वारा बनाए गए वीडियो में दवा लेने के लिए कई लोग काउंटर के आसपास इंतजार करते दिखाई दे रहे हैं। मरीजों का कहना है कि वे काफी देर से खड़े हैं, लेकिन दवा वितरण काउंटर पर जिम्मेदार कर्मचारी मौजूद नहीं है….. यदि यह स्थिति एक-दो मरीजों तक सीमित होती तो इसे संयोग माना जा सकता था, लेकिन वीडियो में एक साथ कई मरीजों की मौजूदगी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है…वीडियो सामने आने के बाद सीएचसी अधीक्षक डलमऊ की ओर से सफाई दी गई कि स्टाफ फ्रेश होने गया था और वायरल वीडियो में कही जा रही बातों में पूरी सत्यता नहीं है। उनका यह भी कहना बताया गया कि ड्यूटी पर तैनात चिकित्सक डॉ. मनीष करीब आधा घंटा पहले ही वहां गए

थे… लेकिन सवाल यह है कि यदि दवा वितरण काउंटर पर कर्मचारी मौजूद नहीं था तो उस समय मरीजों को दवा उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी किसकी थी…? यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि ड्यूटी पर तैनात बताए जा रहे डॉ. मनीष उस समय अपनी ओपीडी में बाकायदा मरीजों को देख रहे थे और अपने चिकित्सकीय दायित्व का निर्वहन कर रहे थे। उन्हें वायरल वीडियो की जानकारी तक नहीं थी। ऐसे में अधीक्षक की सफाई में डॉ. मनीष कुमार का नाम आने के बावजूद मौके की वास्तविक स्थिति से उनका कोई सीधा संबंध नजर नहीं आता। चिकित्सकीय कार्य में व्यस्त डॉक्टर को व्यवस्था संबंधी अव्यवस्था का जिम्मेदार ठहराने के बजाय यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि संबंधित कर्मचारी अपनी ड्यूटी पर क्यों नहीं था…?
*सीएचसी मे रात की व्यवस्था पर भी उठते रहे हैं सवाल*
सीएचसी डलमऊ की समस्या केवल दवा वितरण काउंटर तक सीमित होने का आरोप नहीं है। रात में उपचार के लिए पहुंचने वाले कुछ मरीजों की ओर से समय-समय पर यह आरोप भी लगाए जाते रहे हैं कि मरहम-पट्टी के नाम पर उनसे कथित तौर पर 100 से 50 रुपये भी ले लिए जाते हैं….हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन यदि शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं तो स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारियों के लिए इसकी निष्पक्ष जांच जरूरी हो जाती है….आखिर सवाल केवल एक वायरल वीडियो का नहीं है। सवाल यह है कि सरकारी अस्पताल में मुफ्त स्वास्थ्य सेवाओं का दावा तब कितना प्रभावी है, जब मरीजों को अपनी समस्या का वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डालने के बाद ही व्यवस्था की ओर ध्यान खींचना पड़े…?सीएचसी अधीक्षक यदि प्रत्येक वायरल वीडियो को ही गलत या अधूरा बताकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करते हैं, तो इससे कई गंभीर सवाल पैदा होते हैं। यदि अस्पताल की व्यवस्था वास्तव में दुरुस्त है तो बार-बार ऐसे वीडियो सामने क्यों आ रहे हैं…? यदि स्टाफ पर्याप्त है तो मरीज दवा वितरण काउंटर पर इंतजार करते हुए वीडियो क्यों बना रहे हैं…? यदि रात की व्यवस्थाएं मुकम्मल हैं तो स्ट्रेचर के अभाव और उपचार को लेकर शिकायतें लगातार क्यों सुनाई देती हैं….? अधीक्षक का काम केवल वायरल वीडियो पर सफाई देना नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियां पैदा ही न होने देना है। अधीनस्थ कर्मचारी ड्यूटी पर हैं या नहीं, मरीजों को समय से दवा मिल रही है या नहीं, आपात स्थिति में स्ट्रेचर उपलब्ध है या नहीं और अस्पताल में मरीजों के साथ निर्धारित व्यवस्था के अनुरूप व्यवहार हो रहा है या नहीं इन तमाम बिंदुओं की निगरानी करना भी अधीक्षक की प्रशासनिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। स्वास्थ्य विभाग के शीर्ष पर बैठे जिम्मेदार अधिकारियो से सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हर वायरल वीडियो को खारिज कर देना ही सीएचसी प्रशासन का समाधान है, या फिर बार-बार सामने आ रही शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराकर जिम्मेदारी तय की जाएगी…? क्योंकि मरीजों की परेशानी को केवल वीडियो की सत्यता के तराजू पर तौलने से अस्पताल की व्यवस्था बेहतर नहीं होगी। जरूरत वीडियो को झूठा साबित करने की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को इतना मजबूत करने की है कि मरीजों को अपनी पीड़ा का वीडियो बनाकर व्यवस्था की पोल खोलने की जरूरत ही न पड़े।


