पीड़ितों की तहरीर, बताए गए साक्ष्य और लाखों की रकम… फिर भी जगतपुर थाने में FIR नदारद
साक्ष्यों के साथ तहरीर जाने पर भी जगतपुर थाने में नहीं दर्ज होता मुकदमा
रायबरेली। स्वयं सहायता समूहों से जुड़े करोड़ों रुपये के वित्तीय लेन-देन के बीच फर्जी हस्ताक्षर, कूटरचित प्रस्ताव और कथित तौर पर फर्जी मुहर लगाकर लाखों रुपये की निकासी का प्रयास किए जाने का मामला सामने आया है। गंभीर बात यह है कि जिन महिलाओं ने बैंक में कथित फर्जी दस्तावेज देखकर तत्काल जगतपुर पुलिस से शिकायत की, उनका आरोप है कि जगतपुर पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने के बजाय उन्हें बार-बार थाने बुलाकर समझौते का दबाव बनाना शुरू कर दिया…. सवाल यह है कि जब मामला कथित तौर पर सरकारी धन और बैंकिंग दस्तावेजों में कूटरचना से जुड़ा है तो पुलिस की प्राथमिकता जांच और साक्ष्य सुरक्षित करना है या आरोपित पक्षों के बीच समझौता कराना…? मामला सलोन ब्लाक क्षेत्र के पारी इलाके से जुड़ा बताया जा रहा है। वन देवी महिला प्रेरणा संकुल स्तरीय समिति की अध्यक्ष नीलम, कोषाध्यक्ष उमा देवी और सचिव रेनू बाला ने जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक और जगतपुर थाने में शिकायत देकर आरोप लगाया है कि उनके संगठन से संबंधित बैंक खाता, चेकबुक, समूह की मुहर और प्रस्ताव रजिस्टर कुछ समय से ब्लाक मिशन मैनेजर रजनीश के पास थे। महिलाओं का दावा है कि खाते में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं की धनराशि, सरकारी फंड और अनुदान समेत करीब 75 लाख रुपये मौजूद थे।शिकायत के मुताबिक 11 अगस्त को नीलम बैंक के पास पहुंचीं तो वहां ब्लाक मिशन मैनेजर रजनीश को देखकर उन्हें संदेह हुआ। अगले दिन जब तीनों महिलाएं बैंक पहुंचीं और खाते की स्थिति पूछी तो कथित तौर पर उन्हें बताया गया कि रकम स्थानांतरण की प्रक्रिया में है। इसके बाद दस्तावेज देखने पर महिलाओं ने आरोप लगाया कि विभिन्न चेकबुकों में उनके फर्जी हस्ताक्षर, मुहर और प्रस्ताव लगाकर रकम निकालने के कागजात तैयार किए गए थे। महिलाओं ने इन दस्तावेजों की तस्वीरें भी अपने मोबाइल में सुरक्षित करने की बात कही है। शिकायत में जिन कथित निकासी प्रपत्रों का उल्लेख किया गया है, उनमें सागर महिला समूह के नाम 4.50 लाख, एकता महिला समूह के नाम 3.50 लाख, एकता ग्राम संगठन के नाम 1.50 लाख, विकास महिला के नाम 1.50 लाख, सिंह अग्रवाल एसोसिएट के नाम 23 हजार, प्रकाश महिला के नाम 7.50 लाख, जय हनुमान महिला समूह के नाम 1.50 लाख, 786 महिला के नाम 1.50 लाख तथा साहनी बाबा महिला समूह के नाम 1.50 लाख रुपये शामिल हैं। महिलाओं का दावा है कि इन दस्तावेजों पर उनके हस्ताक्षर और मुहर उनकी सहमति के बिना लगाए गए. ।

*क्या जगतपुर थानेदार निजी के चलते नही दर्ज की एफआईआर*
पीडित महिलाओं का कहना है कि उन्होंने जगतपुर थाने में साक्ष्यों के साथ तहरीर दी, लेकिन अब तक मुकदमा दर्ज नहीं किया गया। उलटे पुलिसकर्मियों द्वारा बार-बार थाने बुलाकर कथित तौर पर समझौते का दबाव बनाए जाने का आरोप है..यहीं से जगतपुर पुलिस की कार्यशैली कठघरे में खड़ी होती है… सवाल उठना लाजमी है यदि शिकायत में संज्ञेय अपराध के पर्याप्त तथ्य हैं तो विधिक प्रक्रिया के तहत कार्रवाई होनी चाहिए या नही। लेकिन शिकायतकर्ता का आरोप है कि उन्हें ही समझौते के लिए बार बार दबाव का सामना करना पड़ रहा है। आखिर पुलिस किस आधार पर कथित पीड़ितों और आरोपित पक्ष के बीच समझौते की भूमिका में दिखाई दे रही है…? दूसरी ओर जगतपुर पुलिस के स्टाफ सूत्रों के मुताबिक जगतपुर थानेदार निजी हित के चलते पीड़ित महिलाओं की सुनवाई करने से कतरा रहे हैं…खैर सवाल ये भी हैं कि अगर बैंक में जमा दस्तावेज वास्तव में फर्जी हैं तो उनके मूल दस्तावेज सुरक्षित करने में देरी किसके हित में है…? समय बीतने के साथ बैंक रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज और डिजिटल साक्ष्यों के प्रभावित होने की आशंका को नजरअंदाज कैसे किया जा सकता है…? ये स्वयं सहायता समूहों से जुड़े संगठन का खाता है, जिसमें कई समूहों की धनराशि आती-जाती है। ऐसे में करीब 75 लाख रुपये की बताई जा रही राशि पर कथित निकासी प्रयास को महज आपसी विवाद मानकर टालना गंभीर सवाल खड़े करता है। महिलाओं ने ब्लाक मिशन मैनेजर रजनीश पर गंभीर आरोप लगाए हैं…हालांकि इन आरोपों की जांच और पुष्टि करने के बजाए जगतपुर पुलिस अप्रत्यक्ष रूप से संरक्षण देते दिख रही..आरोप सही हैं या गलत, इसका अंतिम निर्णय जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही होगा। जगतपुर खाकी पर सवाल स्वभाविक है कि शिकायत और उपलब्ध बताए जा रहे दस्तावेजों के आधार पर अब तक एफआईआर क्यों नहीं…? शिकायतकर्ताओं पर समझौते का दबाव बनाया गया, तो पुलिस किस अधिकार और किस आधार पर ऐसी मध्यस्थता कर रही थी…? करीब 75 लाख रुपये वाले खाते से कथित तौर पर लाखों रुपये निकालने के प्रयास की शिकायत को पुलिस महज विवाद मान रही है या वित्तीय अपराध के नजरिये से देखना ही नही चाह रही है…? मामले में अब निगाहें जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक की ओर हैं। महिलाओं ने उच्च अधिकारियों से हस्तक्षेप की मांग की है। जरूरत इस बात की भी है कि थाना स्तर की कथित निष्क्रियता के आरोपों से अलग स्वतंत्र अधिकारी पूरे मामले की जांच करें, ताकि न शिकायतकर्ता को पुलिसिया दबाव महसूस हो और न ही किसी आरोपित को साक्ष्य प्रभावित करने का अवसर मिले। क्योंकि सवाल सिर्फ लाखो रुपये का नहीं है सवाल उन महिलाओं के भरोसे का है, जिनके नाम पर समूहों की आर्थिक व्यवस्था चलती है और जिनकी चेकबुक पर कथित फर्जी हस्ताक्षर लगाकर सरकारी धन निकालने का आरोप सामने आया है। अब देखना यह है कि जगतपुर पुलिस इस शिकायत को फाइलों में दबाती है, समझौते की कोशिशों तक सीमित रहती है या फिर दस्तावेजों को कब्जे में लेकर निष्पक्ष जांच की दिशा में वास्तव में कोई ठोस कदम उठाती है।


