Hot Topics

सोशल मीडिया से सियासी मंच तक बिना क्रॉस-चेक लेखपाल के चरित्र पर गंभीर वार

सोशल मीडिया से सियासी मंच तक बिना क्रॉस-चेक लेखपाल के चरित्र पर गंभीर वार

सत्ता के विरोध करने में लगे राजनीतिक पार्टियों के शिकार हुआ लेखपाल

रायबरेली। मोबाइल फोन आज सूचना का सबसे तेज माध्यम जरूर है, लेकिन जब यही मोबाइल बिना तथ्यों की पड़ताल किए किसी के चरित्र का फैसला सुनाने का हथियार बन जाए तो मामला महज एक वायरल वीडियो तक सीमित नहीं रहता… निजी हित, पार्टी हित या जातीय पूर्वाग्रह किसी भी मानसिकता के प्रभाव में निष्पक्षता और संवेदनाओं को इतिहास के कूड़ेदान में फेंक कर व्यक्ति पर गंभीर आरोप मढ़ देना आज सोशल मीडिया की सबसे चिंताजनक प्रवृत्तियों में शामिल हो चुका है…मलकेगांव का मामला इसी सवाल को फिर सामने खड़ा करता है….लालगंज तहसील के मलकेगांव में वायरल वीडियो के आधार पर लेखपाल दिनेश सविता पर लगाए गए गंभीर आरोपों की 11 सितंबर को तहसीलदार लालगंज ने स्थलीय जांच की….जांच में पैसे मांगने समेत लगाए गए आरोपों की पुष्टि करने वाला कोई ठोस साक्ष्य सामने नहीं आया। प्रार्थिनी नीलम द्विवेदी और उनकी माता भी ऐसा कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सकीं, जिसके आधार पर लेखपाल को आरोपों का दोषी ठहराया जा सके…जांच आख्या के मुताबिक नीलम द्विवेदी के पिता बाबूशंकर द्विवेदी का कच्चा मकान पहले से क्षतिग्रस्त था और इसी मकान के संबंध में क्षेत्रीय लेखपाल द्वारा पूर्व में ही लाभ दिए जाने के लिए रिपोर्ट भेजी जा चुकी थी…लिहाजा उसी मकान के संबंध में दोबारा घर गिरी का अनुतोष दिया जाना संभव नहीं था…. वहीं 7 सितंबर को लेखपाल ने मकान के आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त होने की सूचना प्रपत्र-20 पर दी, जिसके बाद राजस्व निरीक्षक कार्यालय से ऑनलाइन आवेदन संख्या APPHOM00048— के माध्यम से अग्रिम कार्रवाई की गई…जांच ने विवाद की पारिवारिक पृष्ठभूमि भी सामने रखी। परिवार के सदस्यों के बीच पहले से मनमुटाव और विवाद चला आ रहा था। 11 अगस्त को थाना सरेनी में दोनों पक्षों के बीच समझौता भी हुआ था, जिसमें मकान निर्माण और बरसात के पानी की निकासी को लेकर शर्तें तय की गई थीं, लेकिन बाद में दोनों पक्ष उस सुलहनामे से सहमत नहीं रहे….सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जिस आरोप ने वायरल वीडियो से लेकर सोशल मीडिया और राजनीतिक मंचों तक जोर पकड़ा, उसी आरोप की पुष्टि जांच में नहीं हुई….प्रार्थिनी के पिता बाबूशंकर द्विवेदी, ग्राम प्रधान रामनरेश और ग्रामीण रमेश कुमार समेत अन्य लोगों ने अपने बयानों में लेखपाल को सरल स्वभाव का बताते हुए आरोपों को गलत बताया…जांच आख्या में भी यह निष्कर्ष सामने आया कि लेखपाल के खिलाफ आरोप लगाए जाने के पीछे घर गिरी का अनुतोष न मिलने से उत्पन्न क्षोभ प्रमुख रूप से दिखाई देता है…फिर सवाल उठता है जब जांच पूरी होने से पहले सोशल मीडिया ने फैसला सुना दिया, तब क्या किसी ने तथ्य जानने की कोशिश की…? वायरल वीडियो को आधार बनाकर राजनीतिक दलों और विपक्ष से जुड़े नेताओं की ओर से जिस तरह तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं, उसमें सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार हो सकता है, लेकिन किसी कर्मचारी के चरित्र पर गंभीर टिप्पणी करने से पहले तथ्यों का क्रॉस-चेक करना भी उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है…सत्ता का विरोध लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन सत्ता के विरोध में किसी कर्मचारी की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को निशाना बनाना लोकतांत्रिक विमर्श नहीं कहा जा सकता। आरोप सत्ता पर हो, प्रशासन पर हो या किसी कर्मचारी पर उसकी विश्वसनीयता तथ्य से आती है, वायरल होने से नहीं…मलकेगांव प्रकरण में दस्तावेज कुछ और कहते हैं, स्थलीय जांच कुछ और तस्वीर दिखाती है और ग्रामीणों के बयान भी लगाए गए आरोपों की पुष्टि नहीं करते। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि बिना क्रॉस-चेक किसी व्यक्ति को सोशल मीडिया और सियासी मंचों पर कठघरे में खड़ा करने की जल्दबाजी आखिर क्यों…? क्योंकि आरोप लगाना सबसे आसान काम है। कुछ शब्द लिखिए, वीडियो लगाइए और देखते ही देखते किसी का चरित्र सार्वजनिक बहस का विषय बन जाता है। मगर जब जांच में आरोप पुष्ट नहीं होते, तब उस व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा पर पड़े असर की भरपाई कौन करता है..? वायरल वीडियो ने एक कहानी बनाई थी, प्रशासनिक जांच ने उसका दूसरा पक्ष सामने रख दिया। अब असली सवाल लेखपाल से ज्यादा उस जल्दबाजी पर है, जिसमें जांच से पहले ही फैसला सुना दिया गया।

Tags :

News MPD

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Recent News