
वीडियो में घसीटकर अंदर ले गए फरियादी, सीओ बोले-ससम्मान लाए थे बछरावां प्रकरण में जांच पर बड़ा सवाल
पुलिस के आधिकारिक बयान पर ही खाकी की होती है फजीहत और जनता में घटता खाकी पर विश्वास
रायबरेली। पुलिस जो बोले सिर्फ वही सही बाकी जो दिखता है वो सब झूठा ये पैटर्न लम्बे समय से पुलिसिया जांच में सामने देखने को मिलता है जहां जब खाकी को खाकी की जांच सौंपी जाती तो फार्मूला एक ही लगता है खाकी की जांच में खाकी होनी चाहिए बरी खैर बछरावां थाना गेट से फरियादी को पुलिसकर्मियों द्वारा खींचकर और घसीटकर अंदर ले जाने का वायरल वीडियो अब पुलिस की जांच रिपोर्ट के सामने खड़ा हो गया है…वीडियो में थानाध्यक्ष श्याम कुमार पाल और दरोगा धर्मेंद्र फरियादी को पकड़कर थाने के भीतर ले जाते दिखाई दे रहे हैं। इस दौरान फरियादी की आवाज में बचा लियो भइया की गुहार भी सुनाई देती है। मगर पुलिस की जांच में तस्वीर बिल्कुल उलट है… क्षेत्राधिकारी महराजगंज प्रदीप कुमार ने कहा कि फरियादी रास्ता अवरुद्ध कर थाने के गेट पर बैठ गया था और उसे ससम्मान थाने के अंदर लाया गया…मामले की जांच पुलिस अधीक्षक रवि कुमार ने सीओ महराजगंज को सौंपी थी और कुछ ही घंटों में जांच का निष्कर्ष सामने आ गया। इसके बाद सामने आए दूसरे वीडियो ने जांच के निष्कर्ष पर ही सवाल खड़ा कर दिया…इसमें थाना परिसर से बाहर आए थानाध्यक्ष फरियादी को बिना देर किए पकड़कर अंदर ले जाते दिखाई देते हैं, जबकि दरोगा धर्मेंद्र भी उनके साथ बल लगाते नजर आते हैं… ऐसे में सवाल यह नहीं रह जाता कि वीडियो में क्या दिखाई दे रहा है, बल्कि सवाल यह है कि जांच में वीडियो में दिखाई दे रही कार्रवाई को किस आधार पर ससम्मान की श्रेणी में रखा गया…? पुलिस महकमे में किसी मामले की जांच का उद्देश्य केवल विभागीय पक्ष को सही ठहराना नहीं, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर घटनाक्रम की निष्पक्ष तस्वीर सामने रखना होता है…लेकिन रायबरेली में ऐसे मामलों को लेकर अक्सर यही चर्चा सामने आती रही है कि वायरल वीडियो और प्रत्यक्ष साक्ष्यों में जो दिखाई देता है, उसके विपरीत जिम्मेदार अधिकारियों के आधिकारिक बयान पुलिसकर्मियों को क्लीनचिट देने वाला नजर आता है… यही वजह है कि खाकी की जांच में खाकी को बरी करने के कथित पैटर्न को लेकर सवाल उठते रहे हैं…बछरावां मामले में भी अब वही सवाल सामने है यदि वीडियो मे पुलिसकर्मियों की खींचतान और बल प्रयोग साफ दिखाई दे रहा है तो आखिर खाकी की जांच की निष्पक्षता पर भी सवाल उठना लाजमी है….? क्या महज पुलिसकर्मियों के पक्ष को आधार बनाकर निष्कर्ष निकाल दिया गया..? वैसे हमेशा से ही अलग अलग थाने का चार्ज सम्भालने के दौरान खाकी की फजीहत कराने को लेकर विवादो में घिरे रहे थानाध्यक्ष श्याम कुमार पाल। ऐसे में मौजूदा प्रकरण में वीडियो की आंखों देखी तस्वीर और पुलिस की आधिकारिक जांच के बीच का विरोधाभास महज एक फरियादी से पुलिस व्यवहार का मामला नहीं रह जाता, बल्कि पुलिस की आंतरिक जांच व्यवस्था की विश्वसनीयता का सवाल बन गया है…अब देखना यह है कि उच्चाधिकारी वायरल वीडियो और जांच रिपोर्ट के इस स्पष्ट विरोधाभास पर दोबारा निष्पक्ष पड़ताल कराते हैं या फिर मामला भी उन फाइलों में शामिल हो जाएगा, जिनमें सवाल वीडियो ने उठाए और जवाब जांच ने अपने तरीके से दे दिया।
