सीएमएस बदले, बैनर बदला पर नहीं बदली जिला अस्पताल की बदहाली
नाम बदलते रहे, इंतजाम नहीं जिला अस्पताल में मरीजों की मुश्किलें जस की तस
रायबरेली। जिला अस्पताल में व्यवस्था सुधारने और मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के दावे भले ही जिम्मेदारों की रिपोर्ट में दर्ज होते हों, लेकिन अस्पताल परिसर की मौजूदा तस्वीरें उन दावों पर सवाल खड़े कर रही हैं….सीएमएस का चार्ज बदलने के साथ बैनर पर नाम जरूर बदल गया, मगर मरीजों की परेशानियों में फिलहाल कोई बड़ा बदलाव दिखाई नहीं दे रहा….गर्मी में गैलरियों से कूलर गायब हैं, कई बेडों के नीचे डस्टबिन तक नहीं हैं और शौचालयों की स्थिति सफाई व्यवस्था की हकीकत सामने ला रही है। इलाज के लिए आने वाले मरीज और उनके तीमारदार अस्पताल में चिकित्सा सुविधा के साथ उन बुनियादी व्यवस्थाओं के लिए भी जूझते नजर आ रहे हैं, जिन्हें किसी भी सरकारी अस्पताल की प्राथमिक जिम्मेदारी माना जाता है….चार्ज संभालने के बाद सीएमएस डॉ. पुष्पेंद्र कुमार ने व्यवस्थाओं में सुधार की बात कही थी। इसके बावजूद अस्पताल के डीआरटीबी आइसोलेशन वार्ड के सामने लॉन्ड्री से निकलने वाला पानी लंबे समय से जमा होना व्यवस्था की निगरानी पर सवाल खड़ा कर रहा है…जलभराव के कारण दीवारों के कमजोर होने की आशंका बनी हुई है, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान अब तक दिखाई नहीं दे रहा। अस्पताल परिसर में आवारा कुत्तों की बेरोकटोक आवाजाही भी मरीजों की सुरक्षा और स्वच्छता व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है। मरीज और तीमारदारों की आवाजाही पर नियमों की सख्ती है, लेकिन परिसर में घूमते कुत्तों पर प्रभावी नियंत्रण नजर नहीं आता…ब्लड सैंपल काउंटर पर भी मरीजों को इंतजार करना पड़ रहा है। आरोप है कि कई बार कर्मचारी काउंटर छोड़कर मोबाइल में जादा व्यस्त दिखाई देते हैं….वहीं डॉक्टरों के समय से न पहुंचने की शिकायतें भी मरीजों की परेशानी बढ़ा रही हैं। यदि चिकित्सकीय सेवाओं से लेकर सफाई, कूलर, डस्टबिन और परिसर की निगरानी तक की व्यवस्थाएं सवालों के घेरे में हैं, तो फिर अस्पताल की व्यवस्थाओं की नियमित निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था आखिर कितनी प्रभावी है, यह सवाल जिम्मेदार अधिकारियों के सामने है।
*सिर्फ बैनर पर बदला नाम, सुविधाओं का ब्योरा वही*
जिला अस्पताल परिसर में पूर्व सीएमएस डॉ. महेंद्र कुमार के नाम वाला बैनर हटाकर अब सीएमएस डॉ. पुष्पेंद्र कुमार के नाम का बैनर लगा दिया गया है। अस्पताल की सुविधाओं का ब्योरा लगभग वही नजर आता है….यानी बदलाव सबसे पहले बैनर पर दिखा, जबकि मरीजों से जुड़ी कई मूलभूत समस्याएं अभी भी जस की तस दिखाई दे रही हैं। ऐसे में अस्पताल आने वाले मरीजों के बीच स्वाभाविक सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सीएमएस का नाम बदलने से ही अस्पताल की व्यवस्था बदल जाएगी, या फिर बदहाली की तस्वीर बदलने के लिए जमीन पर भी उतनी ही तेजी से काम होगा…? जिला अस्पताल जिले की सबसे महत्वपूर्ण सरकारी स्वास्थ्य संस्थाओं में शामिल है। ऐसे में यहां की व्यवस्थाओं का सवाल केवल सुविधा का नहीं, बल्कि मरीजों को मिलने वाली स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता और अस्पताल प्रशासन की जवाबदेही से जुड़ा है। अब निगाह इस बात पर है कि तस्वीरों और मरीजों की शिकायतों में दिखाई दे रही इन कमियों पर जिम्मेदार अधिकारी क्या कार्रवाई करते हैं और अस्पताल की व्यवस्था वास्तव में बदलती है या बदलाव फिलहाल सिर्फ बैनर तक सीमित रहता है।



